व्यवस्था के नाम पर सब ज़ायज......!
अम्बिकापुर/ सरगुजा जिला पंचायत कार्यालय व जिले के जनपद कार्यालयों में कुछ इस तरह के कार्य हो रहे हैं, जिसे देख कर यही कहा जा सकता है कि व्यवस्था के नाम पर सब जायज़ है। बस व्यवस्था बनाने के लिये टेबल के निचे से रूपये बढ़ा दो और ज्यादा हुआ तो भाजपा के किसी पहुंच वाले नेता से फोन करवा दो या फिर उसके लेटर पैड द्वारा सोर्स लगवा दो.........................जिला पंचायत सरगुजा के कार्यों पर मैंने पिछले कई महिने से नज़र रखी हुई है। जिसमंे कई चौकाने वाले मामले सामने आए हैं।
यूं तो सरगुजा जिला पंचायत व जिले के जनपद पंचायत की कार्यवाहियों पर पूर्व में भी काफी कुछ लिखा जा चुका है, काफी पत्र-पत्रिकाओं और इलेक्ट्रानिक माध्यमों ने यहां पर होने वाले गड़बड़झाले पर काफी कुछ पूर्व में सामने लाया है। कुछ समय पूर्व ही वेटिंग लिस्ट में शिक्षाकर्मियों की भर्ती में लेट-लतिफी के मामले को प्रमुखता से कई समाचार पत्रों ने उठाया था। जिसके बाद आनन-फानन में वेटिंग लिस्ट के आवेदनों का निराकरण कर शिक्षाकर्मियों की भर्ती की गई थी। कुछ समय से जिला पंचायत के कार्यों को लेकर शिक्षाकर्मियों में जिस प्रकार से असंतोष बढ़ रहा था, इसके बाद जब कुछ लोगों ने मुझे इस बारे में बताया तो मैंने पिछले कई महिने में कई कार्यों को लेकर चक्कर लगाया और कई अन्य लोगों को वहां पर भेज कर कर्इ्र कार्यों को करवाना चाहा, जिसके बाद वहां की जो हकिकत खुल कर सामने आई है, उसने न सिर्फ राज्य शासन के नियमों व निर्देशों को बट्टा लगाया है, बल्कि कई अनियमितता तो ऐसी भी जिसे लेकर कईयों के भविष्य दांव पर भी लगे हुए है। आइये कुछ इसी तरह के जानकारी से आपको भी परिचित कराते हैं।
पैसा लेकर ट्रांसफर का कारनामा सिर चढ़ कर बोल रहा है - जब कभी कोई शिक्षाकर्मी जो कि पैसे वाला व सोर्स वाला होता है, उसकी ट्रांसफर 10 से 15 हजार रूपये लेकर उसके मनचाहे जगह पर व्यवस्था बनाने के नाम पर कर दिया जाता है और ट्रांसफर कर दिया जाता है। कैसे बनती है व्यवस्था - व्यस्था बनाने के लिये जिस शिक्षाकर्मी को अपने मन माकिफ जग चाहिए होती है वह उस जगह के ग्रामीणों से व सरपंच से मिलकर यह प्रस्ताव जिला पंचायत में (शिक्षाकर्मी वर्ग 1 व 2 के लिये) व जनपद में वर्ग 3 के लिये भेज देता है, इसके बाद उस विद्यालय के प्राचार्य व प्रधान पाठक से भी रिक्तता के बाद स्कूल में अध्यापन कार्य प्रभावित होने की बात कह कर एक आवेदन शिक्षकों की संख्या बढ़ाने के लिये लगाए जाते हैं। जिसके बाद जिला पंचायत व जनपद के बाबुओं के द्वारा जिला पंचायत व जनपद सीईओ के माध्यम से व्यवस्था बनाने के नाम पर उनके मनमाफिक जगह पर अटैच कर दिया जाता है, जिसे कुछ समय बाद वहीं पर नियमित हो जाता है, इस कार्य के लिये जनपद स्तर पर 10 से 15 हजार लिया जाता है, जबकि जिला पंचायत में इस रेट में थोड़ा सा इजाफा कर दिया गया है और इसकी किमत 15 से 20 हजार रूपये कर दी गई है।
नोट - जिस भी व्यक्ति को उपरोक्त लेख में कोई संशय हो वह सूचना के अधिकार के तहत् आवेदन लगा कर यह जानकारी मांग सकता है कि जिला पंचायत व जनपद पंचायत द्वारा पूर्व में व्यापम द्वारा लिये गये परिक्षा के बाद नियुक्त किये गये शिक्षाकर्मीयों की नियुक्ति की तिथि क्या थी और वर्तमान में क्या है, वर्तमान में जिला पंचायत व जनपद पंचायत के सीईओ व बाबुओं के द्वारा भ्रष्टाचार को बढ़ाते हुए लगभग 20-30 प्रतिशत शिक्षाकर्मियों कि नियुक्ति दो वर्ष परिविक्षा अवधि पुरा होने के पूर्व कहीं और उनके मन माफिक स्थानों पर कर दिया गया है। इनमें कुछ तो ऐसे भी हैं जो कि एक वर्ष में 3-4 स्थानांतरण का लाभ ले चुके हैं, क्योंकि जिला पंचायत व जनपद पंचायत में इनके रिश्तेदार कार्यरत हैं।
दूसरे परीक्षा में बैठने की अनुमति सभी को नहीं मिलती यहां - चूंकि शिक्षाकर्मी या फिर किसी भी शासकीय कार्यों में यह नियम है कि वे यदि नौकरी में रहते हुए किसी दूसरे कार्य के लिये फार्म भर रहे हैं या फिर परीक्षा में बैठेंगे तो उन्हें इसके लिये अनुमति संबंधित विभाग के वरिष्ठ अधिकारी से ली जाती है, इसके लिये आवेदन करना होता है, जिसके बाद नियमानुसार अनुमति मिलती है। फिलहाल शिक्षाकर्मियों को जिला पंचायत व जनपद पंचायत से अन्य नौकरीयों के लिये आवेदन करने के पूर्व या फिर परीक्षा में बैठने के पूर्व अनुमति लेना छ.ग. पंचायती राज अधिनियम के तहत् आवश्यक है, किन्तु जिला व जनपद पंचायतों के कार्यालयांे में पदस्थ बाबुओं की बाबुगिरी ने कुछ इस तरह का कारनामा कर दिखाया है कि वर्ग तीन के शिक्षाकर्मीयों के वर्ग एक व दो में बैठने व वर्ग दो का वर्ग एक में बैठने के लिये ही इन बाबुओं ने सिर्फ इसलिये कुछ लोगों को अनुमति नहीं दी क्योंकि कुछ लोगों ने इसके लिये अनुमति हेतु सिर्फ आवेदन जमा किया और इसके साथ इन बाबुओं को चढ़ावा नहीं दिया। जिसके कारण उन्हें व्यापम द्वारा आयोजित की गई एक वर्ष पहले की परिक्षा में बैठने की अनुमति नहीं मिल सकी। कुछ शिक्षाकर्मियों ने यह भी बताया कि वर्तमान में बैंक के बहुत सारे जॉब सामने आ रहे हैं, लेकिन जिला व जनपद पंचायतों में बिना रूपये दिये अनुमति नहीं मिलती, जिसके कारण काफी लोग अनुमति नहीं मिलने से इन परिक्षाओं में शामिल नहीं होते।
जो बिना बताए परीक्षा में बैठे हैं, उन्हें महिनों से नहीं मिल रहा है वेतन - जो शिक्षाकर्मी अनुमति के लिये आवेदन तो दिये लेकिन अनुमति नहीं मिलने पर बिना अनुमति विगत व्यापम के परिक्षा में बैठे हैं और पास करके उच्च वर्ग में पहुंच चुके हैं, तब से लेकर अब तक इन शिक्षाकर्मियों को वेतन ही नहीं दिया जा रहा है। ऐसे कई आवेदन जिला पंचायत में पड़े हुए जिन्होंने या तो वर्ग दो से एक में संलग्नीकरण के लिये अनुमति का आवेदन लगाया है या फिर कुछ ऐसे लोग भी है जो परीक्षा अवधि में रहते हुए उच्च वर्ग की परीक्षा उत्तीर्ण कर, उच्च वर्ग में सेवा दे रहे हैं, उन्होंने वेतन हेतु अनुमति मांगी है, उन्हें नियुक्ति तिथि से अब तक वेतन ही नहीं दिये गये हैें।
सीईओ जिला पंचायत - इस विषय पर जब मैंने जिला पंचायत सीईओ से बात की तो सीईओ जिला पंचायत का अनुमति के मसले पर कहना है कि यह हमारा अधिकार है कि किसे अनुमति देना है और नहीं देना। यह आपका अधिकार नहीं कि आप अनुमति मांगे और हम हर परीक्षा में बैठने के लिये आपको अनुमति दे ही दें। वहीं दूसरी ओर परिविक्षा अवधि के दौरान तबादले के खेल पर तैश में आते हुए जिला पंचायत सीईओ ने कहा कि यह हमारा अधिकार है जिसे जहां हम चाहेंगे उसका वहां ट्रांसफर होगा। अब जाओं मुझे काम करने दो मुझे बहुत काम करना है। कुछ इस तरह से जिला पंचायत सीईओ ने मुझे मेरे प्रश्नों को उत्तर दिया। ये तो सीईओ जिला पंचायत ने वो कहा जो वे नियमानुसार जानते और समझते हैं लेकिन शायद उन्हें यह मालुम नहीं कि उनके कार्यालय में टेबल निचे रूपये लेकर हर तरह के कार्य होते हैं और बनते हुए कार्य को भी पैसा नहीं मिलने पर रोक दिया जाता है।
अब तक तो हमने शिक्षाकर्मियों की बात कही अब बात करते हैं जिला पंचायत से पास होने वाले और क्षेत्रों में होने वाले कार्यों की
छ.ग के विकास के लिये पास हुये कार्य होते हैं दूसरे राज्यों में
जब मैंने जिला पंचायत कार्यालय के कार्याे का लेखा जोखा किया तो कुछ चौकाने वाले तथ्य खुलकर सामने आए अभी तीन दिन पूर्व मेरे एक विश्वस्थ मित्र ने बताया कि 35 लाख रूपये की लागत से एक बिहड़ आदिवासी क्षेत्र में नदी के ऊपर पुल बनना था, जिसे जिला पंचायत व संबंधित विभाग के अधिकारियों ने क्षेत्र के विकास के लिये अनुमति दी थी, लेकिन विडम्ना यह रही कि रूपये के बंदरबाट व कमिशनखोरी के चक्कर में जिस पुल को जहां पर बनना था वहां वह पुल तो नहीं बना। किन्तु उसी स्थान के बैकग्राउण्ड में सेट करके फोटो खिंच कर विकास की तस्वीर फाईल में चस्पा कर दी गई है और संबंधित पुल को 20 लाख रूपये खर्च कर छ.ग. के रकम से दूसरे राज्य में उस पुल का निर्माण करा दिया गया है। लेकिन हमारे अधिकारियों को शायद इसकी जानकारी नहीं है। लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि बाकी के बचे 15 लाख रूपये की जानकारी इन भ्रष्टाचारियों को जरूर होगी।
यह खुला पत्र है सरगुजा के वरिष्ठ अधिकारियों व राज्य शासन के लिये यदि अब भी सरकार न जागी तो अब जल्द ही भ्रष्टाचार के विरूद्व जनक्रांति की शुरूआत सरगुजा जिले से ही होगी और इस आंदोलन का नेतृत्व होगा युवा वर्ग व ग्रामीण आमजन के हाथ और तब आंदोलन को समाप्त कराने के लिये जब तक मुख्यमंत्री सीबीआई जांच की घोषणा नहीं करेंगे और जनता की भ्रष्टाचार की रैली में शामिल नहीं होंगे। तब-तक यह आंदोलन बदस्तुर जारी रहेगा। भले ही इस आंदोलन के लिये जिले भर में आवागमन व्यवस्था,व्यवसायीक प्रतिष्ठानों व शासकीय कार्यालयों पर ताला लटकवाने की भी नौबत आती है तो उसके लिये हमारे साथ खड़े हैं, सरगुजा के ग्रामीण क्षेत्रों की वह जनता जिससे विकास आज भी कोसी दूर है और जो इस आंदोलन का नेतृत्व खुद ही करेंगे। हम ना तो महात्मा गांधी के कदमों पर चलने वाले हैं और ना ही हम अन्ना हजारे के कदमों पर जब अनशन के विरूद्ध भी सरकार कार्यवाही करती ही हैंे तो फिर इससे अच्छा है कि विरोध का तरिका ही कुछ ऐसा अख्तियार किया जाए कि जनता तक सरकार सिर्फ ग्राम सुराज के लोक लुभान नारों के द्वारा ही नहीं बल्कि जनता के विरोध को शांत कराने के लिये सामने आए।
अंचल ओझा
प्रधान संपादक
हिन्दी मासिक युवा मत
नोट:- इस लेख को जब मैं लिख रहा था, तब कई सवाल मेरे दिलों-दिमाग पर थे और तब मैंने इसे लिखने से पहले लोगों से सम्पर्क कर उनसे समर्थन की बात की जब विभिन्न क्षेत्र के कुछ युवाओं ने इस अभियान में सहभागीता और समर्थन की बात कही तब कही जाकर मुझे सबल मिला और तब मैंने इस लेख को लिख कर सरकार को जाग जाने हेतु एक अंधकार को हटाने की कोशिश की है।क्योंकि आज के भ्रष्टाचारी न तो गांधीगीरी से समझते हैं और ना ही अन्नागीरी से आज जरूरत है महासंग्राम की।
